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Lockdown2: वक्त से डरे न जाने कब वक्त का बदले मिजाज- सविता अग्रवाल

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“समय बडा बलवान”


“वक़्त से दिन और रात,
वक़्त से कल और आज,
वक़्त की हर शै गुलाम,
वक़्त का हर शै पे राज।
आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिजाज।”
पिछले कुछ समय से उपर्युक्त पंक्तियाँ अक्षरक्षः सत्य प्रकट हो रही हैं।प्रकृति ने स्पष्ट रूप से अवगत करा दिया है कि मानव पृथ्वी पर मेहमान मात्र है किन्तु प्रकृति का मालिक समझने की भूल कर बैठा था, अब भी समय है इस भूल को स्वीकार कर सुधार करना चाहिए।
लाकडाउन की इस अवधि में सभी ने अपनी अपनी समझ और तरीके से इस समय का उपयोग किया है।
सेवा कार्य, ड्यूटी, टीवी,मोबाइल,रचनात्मक कार्य, स्वास्थ्य संबंधी,लेखन……. आदि।
परन्तु इन सबके बाद भी पर्याप्त समय मिला अपने और अपनों के बारे में सोचने का।इस दौरान हमारे पास काफी समय रहा अतीत से सीखने और भविष्य में कुछ बेहतर करते हुए आने वाले कल को स्वर्णिम बनाने का।
तुलसीदास जी ने भी कहा है कि
“बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि लेय।”
अब वक्त है,अतीत से सबक लेते हुए,आत्ममंथन करते हुए ,जो एक नवजीवन सभी को मिला है तो उसे नये सिरे से जीने का।
आज जब जल,वायु, प्रकृति सब शुद्ध हो चुके हैं, तो अन्तर्मन से गिले- शिकवे, शिकवे- शिकायतें, मनोविकार दूर कर आत्मशुद्धि भी करें।
लाकडाउन की शीघ्रातिशीघ्र समाप्ति के बाद हम सभी से अपनेपन के अहसास के साथ रूबरू हो सकें, तो शायद फिर से सभी के जीवन में एक बार पुनः बसन्त का आगमन हो सकेगा।प्रकृति का अतिशय दोहन नहीं करने का संकल्प लेते हुए अभी लाकडाउन के दौरान हमें काफी कुछ अपनी परंपराओं, गौरवशाली संस्कृति से पुनःरुबरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है उससे नजदीकियां बनाए रखते हुए वर्तमान पीढी का उनसे जुडाव बरकरार रखने का प्रयास भी करें।
संपूर्ण विश्व में एक नये युग का आगमन होने जा रहा है।
इस नये युग का स्वागत भारत में हम स्वस्थ मानसिकता और पूर्ण अपनत्व के साथ करें। सोशल डिस्टेंसिग बनाए रखते हुए!

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